दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार विजय की आखिरी फिल्म होने के कारण ‘जन नायकन’ को लेकर दर्शकों में जबरदस्त उत्साह था। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि करोड़ों प्रशंसकों के लिए भावनाओं से जुड़ा एक खास पल था। लंबे समय से बड़े पर्दे पर राज करने वाले विजय से उम्मीद थी कि वह अपने फिल्मी करियर को एक यादगार विदाई देंगे। लेकिन फिल्म उन उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। निर्देशक एच. विनोथ ने इसे एक सशक्त भावनात्मक कहानी बनाने के बजाय राजनीतिक संदेश और विजय की छवि को केंद्र में रखकर पेश करने की कोशिश की है। यही वजह है कि कई जगह फिल्म मनोरंजन से ज्यादा राजनीतिक भाषण जैसी महसूस होती है। फिल्म की शुरुआत काफी प्रभावशाली होती है। कहानी वेत्री (विजय) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो जेल में बंद होने के बावजूद अपने व्यक्तित्व और प्रभाव से हर किसी पर भारी पड़ता है। जेलर श्रीकांत (गौतम वासुदेव मेनन) एक ईमानदार अधिकारी हैं, जो वेत्री के भीतर छिपे इंसान को पहचान लेते हैं। परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि श्रीकांत अपनी बेटी विजी (ममिता बैजू) की जिम्मेदारी वेत्री को सौंप देते हैं।
इसके बाद वेत्री उसके सपनों को पूरा करने का संकल्प लेता है और उसे भारतीय सेना में अधिकारी बनाने की दिशा में आगे बढ़ता है। कहानी का शुरुआती हिस्सा भावनात्मक और प्रेरणादायक लगता है। पिता-पुत्री जैसे रिश्ते, जिम्मेदारी और संघर्ष को अच्छे ढंग से दिखाया गया है। लेकिन कुछ ही समय बाद फिल्म एक साथ कई बड़े मुद्दों को समेटने की कोशिश करने लगती है। महिला सशक्तिकरण, आतंकवाद, राजनीति, भ्रष्टाचार, सत्ता संघर्ष और सामाजिक संदेश जैसे विषय एक के बाद एक सामने आते हैं। नतीजा यह होता है कि मूल कहानी धीरे-धीरे पीछे छूट जाती है। इसी बीच अंतरराष्ट्रीय अपराधी जॉन हिमलर (बॉबी देओल) की एंट्री होती है, जो देश में हिंसा और अस्थिरता फैलाने की साजिश रच रहा है। दूसरी ओर पत्रकार कयाल (पूजा हेगड़े) भी इस घटनाक्रम का हिस्सा बनती हैं। इन किरदारों के जरिए कहानी को बड़ा बनाने की कोशिश तो की गई है, लेकिन पटकथा उन्हें पर्याप्त मजबूती नहीं दे पाती। कई घटनाएं जल्दबाजी में घटती हैं और दर्शक भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ नहीं पाते।
अंतराल तक फिल्म किसी तरह अपनी पकड़ बनाए रखती है, लेकिन इसके बाद कहानी पूरी तरह बिखरने लगती है। ऐसा महसूस होता है कि हर दूसरा दृश्य सिर्फ विजय के स्टारडम को और बड़ा दिखाने के लिए लिखा गया है। कई संवाद और दृश्य दर्शकों से तालियां तो बटोरते हैं, लेकिन कहानी को आगे बढ़ाने में कोई खास योगदान नहीं देते। फिल्म की लंबाई भी इसकी सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक बन जाती है। कई दृश्य जरूरत से ज्यादा खिंचे हुए लगते हैं और गति लगातार धीमी होती जाती है। विजय अपने पूरे आत्मविश्वास और करिश्माई अंदाज में नजर आते हैं। उनकी एंट्री, एक्शन सीक्वेंस, संवाद अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस हमेशा की तरह दमदार है। प्रशंसकों को उनके कई दृश्य निश्चित रूप से पसंद आएंगे। हालांकि, जब पटकथा कमजोर हो तो सिर्फ स्टारडम किसी फिल्म को लंबे समय तक संभाल नहीं सकता।
भावनात्मक कहानी पर भारी पड़ा राजनीतिक रंग, तकनीकी पक्ष भी नहीं छोड़ पाया गहरी छाप
अभिनय की बात करें तो ममिता बैजू फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी साबित होती हैं। उन्होंने अपने किरदार को संवेदनशीलता के साथ निभाया है और भावनात्मक दृश्यों में प्रभाव छोड़ने में सफल रहती हैं। विजय के साथ उनकी केमिस्ट्री भी स्वाभाविक लगती है, जिससे फिल्म के शुरुआती हिस्से को मजबूती मिलती है। बॉबी देओल का खलनायक जॉन हिमलर कागज पर बेहद खतरनाक नजर आता है, लेकिन पर्दे पर उसका प्रभाव सीमित रह जाता है। उनके किरदार को जितनी गहराई और चुनौतीपूर्ण अंदाज की जरूरत थी, वह दिखाई नहीं देती। पूजा हेगड़े के हिस्से में भी बहुत कम दृश्य आए हैं और उनका किरदार कहानी में कोई खास बदलाव नहीं ला पाता। वहीं प्रकाश राज, नासर, प्रियामणि और गौतम वासुदेव मेनन जैसे अनुभवी कलाकार भी सीमित दायरे में सिमटकर रह जाते हैं।
निर्देशक एच. विनोथ ने एक मजबूत भावनात्मक कहानी को बड़े सामाजिक और राजनीतिक संदेशों के साथ जोड़ने की कोशिश की है, लेकिन यही प्रयोग फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। पटकथा कई बार अपने मूल विषय से भटक जाती है और दर्शक यह समझ नहीं पाते कि फिल्म आखिर कहना क्या चाहती है। कुछ दृश्य प्रभावशाली हैं, लेकिन उनके बीच का जुड़ाव कमजोर पड़ जाता है। फिल्म की एडिटिंग भी काफी ढीली महसूस होती है। अगर इसकी अवधि करीब आधा घंटा कम कर दी जाती तो कहानी ज्यादा प्रभावशाली बन सकती थी। खासकर दूसरे भाग में कई दृश्य दोहराव का एहसास कराते हैं। चरम हिस्सा जरूरत से ज्यादा लंबा है और रोमांच पैदा करने के बजाय दर्शकों को थकाने लगता है।
तकनीकी पक्ष में सिनेमैटोग्राफी अच्छी कही जा सकती है। कुछ लोकेशन और एक्शन सीक्वेंस बड़े पर्दे पर आकर्षक लगते हैं। हालांकि, विशेष प्रभाव कई जगह कमजोर नजर आते हैं और बड़े बजट की फिल्म होने के बावजूद अपेक्षित गुणवत्ता नहीं दिखा पाते। पृष्ठभूमि संगीत कुछ दृश्यों में प्रभाव बढ़ाता है, लेकिन पूरी फिल्म को यादगार बनाने में सफल नहीं हो पाता। कुल मिलाकर ‘जन नायकन’ एक ऐसी फिल्म है, जिससे विजय के प्रशंसकों को काफी उम्मीदें थीं। विजय अपनी ओर से पूरी ईमानदारी और ऊर्जा के साथ फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा, जरूरत से ज्यादा लंबी अवधि और कहानी में बार-बार आने वाले राजनीतिक संदेश इसकी सबसे बड़ी बाधा बन जाते हैं। यदि फिल्म अपने भावनात्मक मूल कथानक पर केंद्रित रहती, तो यह विजय के फिल्मी सफर की कहीं अधिक यादगार विदाई साबित हो सकती थी। फिलहाल यह फिल्म शानदार अभिनय के बावजूद एक अधूरी संभावना बनकर रह जाती है।

