दिलजीत दोसांझ की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘सतलुज’ एक बार फिर सुर्खियों में है। लंबे समय से रिलीज का इंतजार कर रही इस फिल्म को 3 जुलाई को बिना किसी आधिकारिक घोषणा के OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर उपलब्ध कराया गया। हालांकि, यह रिलीज ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सकी और कुछ ही घंटों के भीतर फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया। इसके बाद सोशल मीडिया पर इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बहस छिड़ गई। दर्शकों ने सवाल उठाया कि जब फिल्म को रिलीज कर दिया गया था, तो आखिर उसे इतनी जल्दी हटाने की जरूरत क्यों पड़ी। अब इस मामले में केंद्र सरकार ने भी दखल दिया है और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने फिल्म के कंटेंट की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय अंतरविभागीय समिति (Inter-Departmental Committee- IDC) का गठन कर दिया है। फिल्म ‘सतलुज’ दिवंगत मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है। खालरा ने 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और लापता लोगों के मामलों को उजागर कर देशभर में चर्चा बटोरी थी। उनके काम को मानवाधिकारों की लड़ाई का अहम अध्याय माना जाता है। इसी संवेदनशील विषय को बड़े पर्दे पर लाने की कोशिश इस फिल्म के जरिए की गई है। लेकिन विषय की गंभीरता और राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण फिल्म शुरुआत से ही विवादों में घिरी रही।
करीब तीन साल पहले बनकर तैयार हो चुकी इस फिल्म को अब तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से मंजूरी नहीं मिल सकी है। जानकारी के अनुसार, सेंसर बोर्ड ने फिल्म में कई कट और बदलाव सुझाए थे। निर्माताओं का मानना था कि इतने व्यापक बदलाव फिल्म की मूल कहानी और ऐतिहासिक संदर्भों को प्रभावित कर देंगे। इसी वजह से दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक विवाद चलता रहा और मामला कानूनी लड़ाई तक पहुंच गया। इस दौरान फिल्म की रिलीज लगातार टलती रही।
बताया जाता है कि फिल्म का मूल नाम ‘Punjab ’95’ था, जिसे बाद में बदलकर ‘सतलुज’ कर दिया गया। नाम बदलने के बावजूद फिल्म को लेकर विवाद खत्म नहीं हुआ। निर्माता लगातार इसे रिलीज करने की कोशिश करते रहे, जबकि सेंसर बोर्ड की मंजूरी का मामला लंबित बना रहा।
ऐसे में 3 जुलाई को अचानक फिल्म का ZEE5 पर दिखाई देना सभी के लिए हैरानी की बात थी। न तो प्लेटफॉर्म ने पहले से कोई प्रचार किया था और न ही निर्माताओं ने रिलीज की औपचारिक घोषणा की थी।
कुछ दर्शकों ने फिल्म देखनी भी शुरू कर दी थी, लेकिन कुछ ही घंटों बाद इसे प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया। इसके बाद सोशल मीडिया पर फिल्म को हटाए जाने की आलोचना शुरू हो गई। कई लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा, जबकि कुछ लोगों का कहना था कि यदि फिल्म को अभी तक CBFC की मंजूरी नहीं मिली थी, तो उसे सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना नियमों के खिलाफ हो सकता है। यही वजह है कि यह मामला अब केवल फिल्म की रिलीज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया।
CBFC की मंजूरी पर अटका मामला, अब IDC करेगी कंटेंट की समीक्षा
फिल्म को ZEE5 से हटाने की सबसे बड़ी वजह यह रही कि इसे अभी तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का अंतिम प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं हुआ है। भारत में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए फिल्मों को तय प्रक्रिया के तहत CBFC की मंजूरी लेना अनिवार्य होता है। बिना प्रमाणपत्र के किसी फिल्म की रिलीज को लेकर कई कानूनी सवाल खड़े हो सकते हैं। इसी कारण फिल्म के प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद मामला सीधे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तक पहुंच गया। मंत्रालय ने पूरे विवाद को देखते हुए एक उच्चस्तरीय अंतरविभागीय समिति (IDC) का गठन किया है। यह समिति फिल्म के कंटेंट, उसके संवेदनशील पहलुओं और रिलीज से जुड़े सभी तथ्यों की समीक्षा करेगी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि फिल्म को OTT प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराने की प्रक्रिया मौजूदा नियमों और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप थी या नहीं। समिति अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपेगी, जिसके बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
फिल्म में जसवंत सिंह खालरा की भूमिका अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने निभाई है। दिलजीत अपने अलग तरह के किरदारों और गंभीर विषयों पर आधारित फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। इस फिल्म में उनके अभिनय की शुरुआती झलक को भी काफी सराहना मिली थी। यही वजह है कि दर्शक लंबे समय से इसकी रिलीज का इंतजार कर रहे थे। फिल्म का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है, जबकि इसके निर्माण से जुड़े लोगों का कहना है कि यह फिल्म उपलब्ध तथ्यों और ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है तथा इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय की छवि को नुकसान पहुंचाना नहीं है। फिल्म के अचानक हटाए जाने के बाद कई फिल्मकारों और दर्शकों ने पारदर्शिता की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी फिल्म को रिलीज की अनुमति नहीं है, तो पहले से स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए। वहीं दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील विषयों पर बनी फिल्मों के मामले में सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करना बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी तरह का कानूनी विवाद पैदा न हो।
फिलहाल ‘सतलुज’ की दोबारा रिलीज को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। अब सबकी निगाहें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अंतरविभागीय समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि समिति की समीक्षा के बाद आवश्यक मंजूरी मिलती है, तो फिल्म भविष्य में दोबारा OTT या सिनेमाघरों में रिलीज हो सकती है। वहीं यदि कंटेंट में किसी तरह की आपत्ति दर्ज होती है, तो निर्माताओं को अतिरिक्त संशोधन करने पड़ सकते हैं। तीन वर्षों की देरी, सेंसर बोर्ड के साथ लंबी कानूनी लड़ाई, बिना घोषणा के OTT रिलीज, कुछ घंटों बाद फिल्म का हटाया जाना और अब केंद्र सरकार की उच्चस्तरीय जांच इन सभी घटनाक्रमों ने ‘सतलुज’ को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में समिति की रिपोर्ट और सरकार के फैसले से ही तय होगा कि दर्शकों को यह बहुप्रतीक्षित बायोपिक आखिर कब और किस रूप में देखने को मिलेगी।

